पूर्व मंत्री की याद में सिविल अस्पताल में बांटे फल, संस्मरणों के जरिए समर्थकों ने किया नमन
बैजनाथ, 30 जून (वीर खड़का)।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति के पुरोधा और बैजनाथ के ‘विकास पुरुष’ स्वर्गीय पंडित संत राम की पुण्यतिथि के अवसर पर आज समूचे क्षेत्र में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। बैजनाथ स्थित पंडित संत राम राजकीय महाविद्यालय में उनके पद-चिह्नों पर चलने वाले समर्थकों व युवा टीम ने उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस मौके पर बैजनाथ सिविल अस्पताल में मरीजों को फल भी वितरित किए गए।
हिमाचल की राजनीति में पंडित संत राम के कद और प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 30 जून, 1998 को जब उनका निधन हुआ, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बेहद भावुक होकर कहा था, “संत राम का निधन ऐसा है, जैसे मेरे शरीर से मेरी बाजू अलग हो गई हो।” वीरभद्र सिंह जब भी किसी राजनीतिक या प्रशासनिक संकट में घिरते थे, तो पंडित संत राम ही संकटमोचक बनकर उन्हें बाहर निकालते थे। उनकी गिनती ‘राजा साहब’ के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में होती थी।
चौबीन पंचायत के प्रधान से कैबिनेट मंत्री तक का सफर
साल 1944 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले पंडित संत राम ने 54 वर्षों तक सक्रिय राजनीति की। उन्होंने जमीनी स्तर पर चौबीन पंचायत के प्रधान के रूप में सफर शुरू किया। इसके बाद वे बैजनाथ पंचायत समिति के अध्यक्ष बने और फिर प्रदेश विधानसभा पहुंचे।
- पहला चुनाव: साल 1972 में पहली बार विधायक चुने गए और 1990 तक लगातार जीत दर्ज की।
- मंत्रिमंडल में भूमिका: वे 1980 से 1982 तक राज्यमंत्री रहे। इसके बाद जून 1982 से 1985 तक शिक्षा मंत्री, 1985 से 1990 तक कृषि मंत्री और 13 दिसंबर, 1993 से 1998 तक प्रदेश के वन मंत्री रहे।
जनता की नब्ज पहचानने वाले नेता: एक दिलचस्प संस्मरण
पंडित संत राम के बारे में वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संजीव शर्मा का एक दिलचस्प संस्मरण आज भी लोगों की जुबां पर है। उन्होंने एक चुनाव के दौरान लिखा था कि पंडी जी हल्की बारिश के बीच घिरथोली में नुक्कड़ सभा से बाहर निकल रहे थे। तभी उन्होंने एक ग्रामीण को नाम से पुकारा और कांगड़ी (पहाड़ी) में पूछा— “तेरा बल्द (बैल) बमार था… हूण क्या हाल तिस्दा?”
आगे बढ़े तो एक बच्चे को देखकर गाड़ी रुकवाई और बोले— “ओए तू फलाने दा जागत (बच्चा) है ना? पिछली बारी फेल होई गया था, इसबारी मन लाई करी पढ़यां…” दोपहर को जब वे एक कार्यकर्ता के घर भोजन के लिए हाथ धोने उठे, तो मेजबान के बिना बताए ही बोल पड़े— “तां कुत्तू लेई चला… गुसलखाना ता दुए बखे है (वाशरुम तो दूसरी तरफ है)।” मेजबान ने मुस्कुराकर कहा था कि अब इधर नया बना लिया है।
अगले दिन अखबार के फ्रंट पेज पर पहाड़ी में हेडिंग छपा— “पंडते जो पता हुंदा कुस दी मैस सुइयो कन्ने कुसदा बल्द बमार है” (पंडित जी को सब पता रहता है कि किसकी भैंस ब्यायी है और किसका बैल बीमार है)। हालांकि लेख में यह भी लिखा था कि वे अपने जीवन का सबसे कठिन चुनाव लड़ रहे हैं, जिसे वे महज 1100 वोटों से जीते थे। अगले दिन पंडी जी ने चुनाव को कठिन तो नहीं माना, लेकिन इस पहाड़ी हेडिंग को देखकर बेहद चहके और बोले— “मज़ा आई गया।”
अस्पताल में फल बांटे, ये रहे उपस्थित
आज उनकी पुण्यतिथि पर बैजनाथ को विकास के पथ पर अग्रसर करने वाले इस मसीहा को याद करते हुए अस्पताल में मरीजों का हालचाल जाना गया। इस अवसर पर बीडीसी अध्यक्ष संजय ठाकुर, बीडीसी उपाध्यक्ष वीरू कपूर, युवा नेता रिशव पांडव, समाजसेवी युद्धवीर राणा, बैजनाथ व्यापार मंडल के अध्यक्ष मनोज कपूर, वीरेंद्र राणा, संजय सोनी, रमेश वर्मा, रमेश चौहान, चेतक कंवर, रसम चन्द राणा उपस्थित रहे।
इनके अलावा पूर्व प्रधान नगहेड़ तिलक डोगरा, विवेक अवस्थी, महाकाल पंचायत के उप प्रधान विलायती राणा, सकड़ी पंचायत के उप प्रधान नरेश कटोच, सुरेंद्र भंडारी, नागेंद्र चंद कटोच, अंकुश राणा, दिनेश राणा, मनोज कपूर, राजीव दीक्षित, सुधा कटोच, संदली कटोच, शुभ राणा, सौरभ चौधरी, रोहित मेहरा, राहुल कौंडल और सौरभ शर्मा सहित कई अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।
