July 21, 2026
Shimla

Himachal News :हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का कहर: नदियों और हवा की गुणवत्ता खतरनाक, पेड़-पौधे ऊंचाई की ओर खिसके, शिमला में बर्फबारी घटी

Climate Change In Himachal
शिमला, 5 जून 2025: हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग, अनियंत्रित शहरीकरण, वाहनों की बढ़ती संख्या और वन कटान के कारण नदियों और हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक गिर गई है। साथ ही, पेड़-पौधे अपनी परंपरागत बेल्ट छोड़कर ऊंचाई की ओर खिसक रहे हैं, और शिमला जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई है। ग्लेशियरों के पिघलने से सैकड़ों नई झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं का कारण बन सकती हैं।

पेड़-पौधों का ऊंचाई की ओर खिसकना

हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान, शिमला के ताजा अध्ययनों के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में देवदार, नीला चीड़, बुरांस और हिमालयी फर जैसी प्रजातियां 100 से 1000 मीटर ऊंचाई की ओर खिसक चुकी हैं। ये प्रजातियां अब अपनी परंपरागत बेल्ट में नहीं उग पा रही हैं। संस्थान के जैव वैज्ञानिक डॉ. विनीत जिस्टू ने बताया कि हर दशक में औसतन 20-25 मीटर की ऊंचाई में बदलाव देखा जा रहा है। देवदार अब 3000 मीटर की ऊंचाई तक पहुंच चुका है, जबकि बान, ओक और चीड़ जैसी प्रजातियां निचले और मध्यवर्ती जंगलों में सिमट रही हैं। बढ़ते तापमान के कारण ठंडे क्षेत्रों के पेड़-पौधों को उगने के लिए कम जगह मिल रही है, जिससे उनकी संख्या में कमी आ रही है।

शिमला में बर्फबारी 37% घटी

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शिमला में बर्फबारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 1990-2000 के दशक में औसतन 129.1 सेमी बर्फबारी होती थी, जो 2010-2020 में घटकर 80.3 सेमी रह गई। बीते तीन सर्दियों में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक रहा—2022-23 में मात्र 6 सेमी, 2023-24 में 7 सेमी, और 2024-25 के इस सीजन में अब तक केवल 9.5 सेमी बर्फ गिरी। मौसम विभाग के वैज्ञानिक संदीप शर्मा ने बताया कि तापमान में बढ़ोतरी के कारण मौसम चक्र में बदलाव हो रहा है, जिससे बर्फबारी का पैटर्न अनिश्चित हो गया है। इससे पर्यटन और बागवानी जैसे क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

सतलुज बेसिन में 52 नई झीलें

राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र, शिमला की रिपोर्ट के अनुसार, सतलुज नदी के कैचमेंट क्षेत्र में 2022 की तुलना में 2023 में झीलों की संख्या 414 से बढ़कर 466 हो गई। ये नई झीलें ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का परिणाम हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ये झीलें भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ावा दे सकती हैं। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के संयुक्त सदस्य सचिव डॉ. सुरेश अत्री ने बताया कि ग्लेशियरों के पिघलने से सतलुज और अन्य नदियों के जलस्तर में बढ़ोतरी हो रही है, जबकि ऊपरी इलाकों में शुष्क क्षेत्र बन रहे हैं।

नदियों की गुणवत्ता में गिरावट

प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, ब्यास, सिरसा, गिरि और अश्विनी खड्ड जैसी प्रमुख नदियों की जल गुणवत्ता राष्ट्रीय मानकों से नीचे (सी श्रेणी) आ गई है। सिरसा नदी में बीओडी (बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड) का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ गया है। राज्य में प्रतिदिन 210.5 मिलियन लीटर गंदा पानी उत्पन्न हो रहा है, जबकि शोधन क्षमता केवल 119.5 मिलियन लीटर है। इसके चलते 129.7 मिलियन लीटर गंदा पानी बिना शोधन के नदियों में बहाया जा रहा है, जिससे जल प्रदूषण बढ़ रहा है।

शिमला की हवा भी असुरक्षित

शिमला की वायु गुणवत्ता में भी गिरावट देखी गई है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, 2011 में शिमला का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 35 था, जो 2024 में बढ़कर 52 हो गया। पीएम 10 और पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर चिंताजनक रूप से बढ़ा है, जो शहरीकरण और वाहनों की बढ़ती संख्या का परिणाम है।

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