बैजनाथ (कांगड़ा), 2 नवंबर। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैराग्लाइडिंग के क्षेत्र में विख्यात बीड़ बिलिंग घाटी में साहस और रोमांच की उड़ान मानवीय परिंदों की जान पर भारी पड़ने लगी है। तमाम प्रशासनिक और आधिकारिक एडवाइजरी जारी किए जाने के बावजूद लगातार हो रहे हादसों ने कहीं न कहीं एक बहस को जन्म दे दिया है कि आखिर इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जाए। बीते 1 सप्ताह में ही चार पैराग्लाइडर पायलट धौलाधार की पहाड़ियों में दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं, जिनमें से एक विदेशी पायलट की मौत भी हो चुकी है।
हाल ही में, मनाली में एक रूसी नागरिक घायल हो गया और धर्मशाला के पास एक कनाडाई पायलट की मौत हो गई। बरोट घाटी में फंसे एक ऑस्ट्रियाई पायलट को बचाया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि हवा का अचानक रुख बदलना दुर्घटनाओं का मुख्य कारण है। मौसमीय परिस्थितियों से अनजान पायलट धौलाधार के आगे पीर पंजाल पर्वत श्रृंखलाओं की ओर चले जाते हैं, जहां उन्हें पर्याप्त थर्मल नहीं मिलते और पैराग्लाइडर सकिंग होने की वजह से दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं या फिर आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ती है।
पायलटों की दुर्घटनाग्रस्त होने का पता तब चलता है जब देर समय अन्य पायलट यह आकलन करते हैं कि कौन-कौन पायलट कहां-कहां उतरा है। हालांकि अधिकांश देशों में 911 एयर रेस्क्यू की सुविधा उपलब्ध है और एसओएस की मदद से दुर्घटना की जानकारी कंट्रोल रूम में पहुंच जाती है, इसके बाद तुरंत रेस्क्यू कर लिया जाता है, लेकिन यह सुविधा भारत में नहीं है। सबसे अधिक दुर्घटनाओं का कारण मौसम का अचानक बदल जाना माना जा रहा है। कई बार मौसम अनुकूल होने के बावजूद भी पायलटों को ऊंचे पहाड़ों के बीच थर्मल नहीं मिलते, जिस कारण उन्हें इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ती है, लेकिन पहाड़ी इलाका होने से ग्लाइडर चट्टानों से टकराते हुए क्रैश हो जाते हैं।
एसोसिएशन की रेस्क्यू टीम हमेशा तैयार
बिलिंग पैराग्लाइडिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष अनुराग शर्मा का कहना है कि संगठन की तरफ से रेस्क्यू टीम हर दम तैयार रहती है। लंबी उड़ान के वक्त पायलट अपने साथ पानी, चॉकलेट, मेवे जैसी चीजें रखें ताकि आपात स्थिति में लैंडिंग के बाद रेस्क्यू टीम पहुंचने तक उन्हें भूख की वजह से जान न गवानी पड़े। विदेशी पायलटों को उड़ान से पहले मौसम और भौगोलिक जानकारी मुहैया करवाई जाती है।
प्रशासन विचार कर रहा मैस्टैटिक डिवाइस खरीदने पर
एसडीएम बैजनाथ संकल्प गौतम ने कहा है कि सरकार और प्रशासन पैराग्लाइडर पायलटों की सुरक्षा के लिए चिंतित है। कई विदेशी पायलट सोलो उड़ान के दौरान लंबी दूरी के लिए निकल जाते हैं, वहां थर्मल ना मिलने की वजह से आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ती है। प्रशासन इस पर विचार कर रहा है कि एरो स्पोर्ट्स अथॉरिटी से मैस्टैटिक डिवाइस खरीदने पर विचार कर रहा है, जो रेडियो फ्रीक्वेंसी रिले टावर से जुड़े होने की वजह से हर पायलट की लोकेशन तुरंत कंट्रोल रूम तक पहुंच जाती है।
पहली उड़ान और चाचू की दुकान
पहली दफा 23 सितंबर 1980 को बिलिंग के टेकऑफ पॉइंट से अमेरिका के कीट और नील नामक दो पायलटों ने हैंग ग्लाइडर के माध्यम से उड़ान भरी थी। उस समय बीड़ से बिलिंग तक सड़क मार्ग मुकमल नहीं था, लिहाजा पूर्ण चंद नामक एक व्यक्ति ने टेकऑफ पहुंचने के लिए दोनों पायलटों की मदद की थी। कड़कती ठंड में जंगल से लकड़ी इकट्ठी कर पत्थर के बर्तन में चाय बनाकर पिलाई थी। उनकी सलाह पर ही पूर्णचंद ने बिलिंग के टेकऑफ पॉइंट पर छोटी सी चाय की दुकान खोली थी, जो आज एक पर्यटक गांव के रूप में विकसित हो चुका है जहां दर्जनों परिवार स्वरोजगार से जुड़े हैं। उसके बाद से अब तक घाटी में कई पैराग्लाइडिंग प्री वर्ल्ड कप, वर्ल्ड कप और क्रॉस कंट्री जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित की जा चुकी हैं।
