शिमला, 4 फरवरी 2026
हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के चुनाव को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस की सुक्खू सरकार ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के 9 जनवरी 2026 के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दाखिल कर दी है। इस फैसले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 30 अप्रैल 2026 से पहले पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराने के सख्त निर्देश दिए थे।
भाजपा विधायक सुधीर शर्मा ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए लिखा कि एसएलपी में याचीकर्ता और प्रतिवादी दोनों पक्षों में राज्य सरकार के अधिकारी दिख रहे हैं, जिससे यह “सरकार बनाम सरकार” जैसा मामला लग रहा है। उन्होंने इसे “चोरे दा गवाह मोर” करार दिया।
गौरतलब है कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच (न्यायमूर्ति विवेक ठाकुर और रोमेश वर्मा) ने जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद स्पष्ट आदेश दिया था कि आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act) के बहाने चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टाला नहीं जा सकता। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग (एसईसी), पंचायती राज विभाग, शहरी विकास विभाग और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को 28 फरवरी 2026 तक सभी तैयारियां पूरी करने और उसके बाद 8 सप्ताह के भीतर यानी 30 अप्रैल से पहले चुनाव संपन्न करने का निर्देश दिया था।
पहले सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती न देने की बात कही थी, लेकिन अब यू-टर्न लेते हुए एसएलपी दाखिल की गई है। अभी तक सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सूचीबद्ध (लिस्ट) नहीं हुआ है।
पृष्ठभूमि में, हिमाचल में पंचायत चुनाव दिसंबर 2025-जनवरी 2026 में होने थे, लेकिन 2025 की मानसून आपदा के चलते सरकार ने डिजास्टर एक्ट लागू कर इन्हें टाल दिया। 31 जनवरी 2026 को अधिकांश पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो गया, जिसके बाद सरकार ने प्रशासकों की नियुक्ति कर दी। भाजपा ने इसे राज्य के इतिहास में पहली बार ऐसा कदम बताते हुए विरोध किया है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने 30 जनवरी तक जिलों के डीसी को मतदाता सूचियां अधिसूचित करने के आदेश दिए थे, लेकिन केवल शिमला, चंबा और लाहुल-स्पीति जिलों में ही यह काम हुआ। 8 फरवरी तक आरक्षण रोस्टर जारी करने का निर्देश है, लेकिन तैयारी धीमी होने से चुनाव समय पर होने पर संशय बना हुआ है।
यदि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित रहा या सरकार को राहत मिली, तो 30 अप्रैल की समयसीमा प्रभावित हो सकती है। मानसून से पहले चुनाव कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे प्रक्रिया और विलंबित हो सकती है। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी करार दे रहा है, जबकि सरकार आपदा के प्रभाव और प्रशासनिक चुनौतियों का हवाला दे रही है।
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिका है, जहां से पंचायत चुनावों की समयसीमा तय होगी।
