शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्लास्टिक और ठोस कचरे से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना ने पीटरहॉफ, शिमला में आयोजित एक कार्यक्रम में बताया कि राज्य मंत्रिमंडल ने प्लास्टिक उत्पन्न करने वालों और प्रदूषण फैलाने वालों की जिम्मेदारी तय करने का निर्णय लिया है। इसके तहत चालान प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए नया एक्ट लाया जा रहा है, ताकि कार्रवाई में आसानी हो।
सक्सेना ने कहा कि प्रत्येक जिले में पर्यावरण कार्यालय स्थापित करने का फैसला लिया गया है, जो प्रदूषण नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हिमाचल ने पहले रंगीन पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया था, और अब सभी प्रकार की पॉलीथिन पर रोक है। इसके अलावा, बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक को भी बैन कर दिया गया है, क्योंकि यह 35 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान में विघटित नहीं होता, जो हिमाचल के जलवायु के अनुकूल नहीं है।
सरकार ने टैक्सियों और बसों में कूड़ेदान अनिवार्य करने के साथ-साथ सरकारी कार्यक्रमों और होटलों में 500 मिलीलीटर तक की प्लास्टिक बोतलों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। मुख्य सचिव ने बताया कि हिमाचल प्रदेश डिपोजिट रिफंड स्कीम 2025 को कैबिनेट ने मंजूरी दी है, जिसके तहत प्लास्टिक बोतलें, कांच, एल्यूमिनियम केन और मल्टीलेयर पैकेजिंग पर अतिरिक्त शुल्क लिया जाएगा। यह शुल्क कलेक्शन सेंटर पर खाली पैकेजिंग जमा करने पर वापस होगा। यह स्कीम पर्यटक स्थलों पर पायलट आधार पर शुरू होगी, जिससे कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलेगी।
बिरला टेक्सटाइल और नेस्ले का योगदान
कार्यक्रम में बिरला टेक्सटाइल मिल, बद्दी के रोहित अरोड़ा ने बताया कि उनकी कंपनी प्लास्टिक रिसाइकिल और फाइबर पर काम कर रही है। बड़ोग में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर स्थापित किया गया है, जहां अगले पांच साल में एक करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। वहीं, नेस्ले इंडिया के वैभव पटेल ने कहा कि उनकी कंपनी 2019 से हिमाचल को सहयोग दे रही है और प्रदेश में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए तीन करोड़ रुपये खर्च करेगी।
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में हिमाचल को ग्रीन स्टेट बनाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देंगे, बल्कि पर्यटकों और स्थानीय लोगों में जागरूकता भी पैदा करेंगे।
