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Baijnath News: वक्त बदला, हालात बदले… पर हिम्मत और मेहनत कभी नहीं बदली। संघर्ष से सफलता तक की कहानी -आदर्श बेकरी

बैजनाथ 22 नवंबर 2025 (वीर खड़का )

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ में आज जहाँ “आदर्श बेकरी” का नाम सुनते ही लोगों के मुँह में पानी आ जाता है, उसकी शुरुआत एक विभाजन-पीड़ित परिवार ने 1947 के बाद की थी। पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत आए इस परिवार ने पहले नगरोटा और फिर पालमपुर को अपनी कर्मभूमि बनाया और हिमाचल में बेकरी का नया अध्याय लिख डाला।

हिमाचल में बेकरी का पहला परचम

“उस समय पूरे हिमाचल में बेकरी सिर्फ़ शिमला में थी, वो भी अंग्रेजों की। कांगड़ा जिले में तो हमारी दुकान सबसे पहली बेकरी थी और पूरे प्रदेश में दूसरी। लोग ब्रेड-बिस्किट देखकर हैरान रह जाते थे कि ये क्या चीज़ है!”

– यह यादें हैं आदर्श बेकरी के संस्थापक तिलक राज वासुदेव के ।

1947 के विभाजन के बाद परिवार पहले नगरोटा (कांगड़ा) आया। तिलक राज वासुदेव के पिताजी के मामा को पहाड़ी इलाका इतना भाया कि 1950 में वे पालमपुर पहुँचे और 1952 में पालमपुर बाज़ार में अपनी पहली दुकान खोली। कच्चे बाज़ार, लकड़ी के दरवाज़े और हाथ से बनने वाले बिस्किट-ब्रेड – यही था उस दौर का सच।

12 मार्च 1954 : वो भयानक आग जो सब कुछ छीन ले गई

12 मार्च 1954 की सुबह साढ़े पाँच बजे। कारीगर भट्टी पर काम कर रहा था। वह टॉयलेट गया और पीछे से भट्टी की आग ने पूरी दुकान को अपनी चपेट में ले लिया। देखते-ही-देखते आग पूरे बाज़ार में फैल गई।

नतीजा? पालमपुर का 75 प्रतिशत बाज़ार जलकर राख हो गया।

“मैं उस दिन सातवीं क्लास में पढ़ता था। उसी दिन 12 मार्च को मेरा साइंस का पेपर था। सब कुछ खत्म हो गया था।”

– दर्द भरी यादें आज भी परिवार के बुजुर्गों की आँखें नम कर देती हैं।

तीन-चार साल का भयानक संघर्ष

आग के बाद कोई भी दुकान मालिक बेकरी वालों को जगह देने को तैयार नहीं था।

“लोग कहते थे – इनके यहाँ भट्टी होती है, फिर आग लग जाएगी।”

परिवार को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

फिर 1957 में परिवार ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने बाज़ार में ही एक जली हुई दुकान ख़रीदी और चुनिंदा प्रोडक्ट्स के साथ दोबारा शुरुआत की। धीरे-धीरे आदर्श बेकरी ने फिर रफ्तार पकड़ी।

नई ऊँचाइयाँ और नए झटके

•  1972 में पहली बार कुछ मशीनें आईं – उत्पादन बढ़ा।

•  1992 में नगरोटा में अत्याधुनिक ऑटोमैटिक बिस्किट प्लांट लगाया गया।

•  लेकिन साल 2000 में बाज़ार में भारी नुकसान हुआ। 3-4 करोड़ रुपये की लागत वाली फैक्ट्री बंद करनी पड़ी।

तीसरी बार नई शुरुआत – बैजनाथ में नया अध्याय

2003 में परिवार ने हार नहीं मानी। बैजनाथ की ओर रुख किया और वहाँ नया आदर्श बेकरी खोला। इस बार नए ज़माने के प्रोडक्ट्स के साथ – पिज्ज़ा, बर्गर, केक और क्या-क्या नहीं! आज बैजनाथ से लेकर पालमपुर तक आदर्श बेकरी का नाम लोग बड़े अदब से लेते हैं।

सात दशकों में तीन बार सब कुछ जल चुका है, डूब चुका है, लेकिन हर बार परिवार ने राख से नया कारोबार खड़ा किया। यह कहानी सिर्फ़ एक बेकरी की नहीं, बल्कि उस जज़्बे की है जो विभाजन के दर्द को भी हिमाचल की मिठास में बदल देता है। आज भी

तिलक राज वासुदेव कहते है -“जब तक हिम्मत है, भट्टी फिर जल सकती है… और नई खुशबू पूरे हिमाचल में फैल सकती है।”

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