बैजनाथ 26 जुलाई
वर्ष 1999.. करगिल की ठंडी पहाड़ियां… दुश्मन की नापाक हरकत…आतंक की काली छाया और पाकिस्तानी फौज की कायराना हरकत। इन सब पर भारी साबित हुआ भारतीय फौज के जांबाज सिपाहियों की रगों में दौड़ता हुआ भारतीयता का खून दिलों में मचलता देशभक्ति का जज्बा। हिंदुस्तान की उन तमाम मांओं को शास्वत वंदन, जिनकी कोख ने भारत मां के आंचल में लगे धब्बों को अपने खून से धो डाला। उस अघोषित लड़ाई में किसी का बेटा, किसी का भाई, किसी का महबूब, किसी का सुहाग, और किसी ने पिता का दुलार खो दिया। देश पर जान न्यौछावर कर देने वाले अपने बेटे के क्षत विक्षत शव को देखकर एक मां तो कुछ यूं पूछ बैठी – साहेब आप तो एक इंच भी कम नहीं लेते फिर मैं यह आधा अधूरा शरीर कैसे ले लूं… ???
बहुत कुछ ऐसे ही सवाल पूछता है कारगिल युद्ध । जहां जुलाई मास में ही खून जमा देने वाली पहाड़ियां भी हमारे हिंदुस्तानी शहीदों को याद करते हुए सिसकती हैं । प्रश्न यह भी कि अगर ऐसा भी है तो उन भारतीय माताओं का दिल अब तलक भी वतन पर शहीद हुए अपने बेटों के फिर लौट आने की उम्मीद में बरसों से तड़पता न होगा क्या….? बेशक उस दौर में हमने कई युवा फौजियों को अघोषित युद्ध की बलिवेदी पर चढ़ते हुए देखा मगर उनके बलिदान के बदौलत ही आज हम आजादी की हर सालगिरह मनाने को तैयार हैं। धन्य है उस माता की कोख़ जिसने जन्मे हैं ऐसे लाल, धन्य हैं पिता के वो मजबूत कंधे जिन पर चढ़कर शूरवीरों ने बचपन में दुनिया देखी और बुढ़ापे में उन्हीं के कंधों पर सवार होकर चल पड़े अपनी अंतिम यात्रा की तरफ, कई दूधमुंहे बच्चों को पिता के प्यार का उस वक्त एहसास होगा जब वह बड़े होकर अपने पिता की वीर गाथा को सुनेंगे। ऐसी कई सुहागिनें बेवक्त वीर नारियां बन गईं जो यह अरमान लेकर फौजी से ब्याही गई थी कि वह जीवन भर उनकी जीवन संगिनी बनकर साथ रहेंगी और ऐसी भी कई प्रेमिकाएं अपने होने वाले जीवनसाथी का उन राहों पर इंतजार अब भी करती हैं जिन राहों से उनके महबूब देशसेवा के लिए गए थे। आज भी जब सैन्य भर्ती की एक आवाज़ भारतीय सेना द्वारा लगाई जाती है तो हजारों हिमाचली कतार बद्ध होकर देश सेवा के लिए पंक्तियों में अग्रणी मिलते हैं। इस कार्रवाई में उनकी माताएं और पिता अगली पीढ़ी को सेना में भेजने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।
साभार विकास बावा पंजाब केसरी
