January 22, 2026
Chamba

Minjar Fair: जाने क्या है चम्बा मिंजर मेले का इतिहास , क्या वजह है जो इस मेले का नाम मिंजर पड़ा।

चम्बा, मिंजर मेले का इतिहास

20 जूलाई 2024 ( विकास ) चम्बा

मिंजर मेला हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में मनाया जाता हैl यह मेला श्रवण माह के दुसरे रविवार को या यूँ कहें कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार जुलाई महीने के अंत व् अगस्त महीने में शुरू होता हैl यह मेला अंतराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता हैl इस मेले में न केवल हिमाचल के लोग बल्कि दुसरे राज्यों के लोग भी शामिल होते हैl यह मेला चम्बा के ऐतिहासिक चौगान मैदान में आयोजित किया जाता हैl इस मेले को चौगान मैदान में मिंजर ध्वज लहराने के साथ शुरू किया जाता है जो एक सप्ताह तक चलता हैl इस मेले में रात्री कार्यक्रम, खेल-कूद प्रतियोगिता और झांकियां जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैl जानते है, इस मेले के इतिहास के बारे में कब यह मेला शुरू हुआ और समय के साथ साथ इस मेले में क्या बदलाव देखे गए?

इतिहास

मिजर शब्द का अर्थ है मक्की व् धान की खेती में फसल लगने से पहले लगने वाले फूलों को मिंजर कहते हैl कहा जाता है कि मिंजर मेले की शुरुआत 935 ई. में हुई थी जब चम्बा के राजा, त्रिगर्त (कांगड़ा) के राजा पर विजय प्राप्त कर के अपने राज्य लौटे थेl उस समय चम्बा के स्थानीय लोगों ने अपने राजा के विजयी होकर लौटने की खुशी में उन्हें मिंजर व् मौसमी फल भेंट किये थेl उस समय से मिंजर मेले की शुरुआत हुईl चम्बा शहर की स्थापना 920 ई. में राजा साहिल बर्मन ने की थीl उन्होंने चम्बा शहर का नाम अपनी पुत्री चम्पावती के नाम पर रखा थाl इस मेले में मिंजर व् मौसमी फल को काफी महत्वता दी जाती हैl मिंजर से ही मेले की शुरुआत होती है, इसी का ही चढ़ावा चड़ता है और प्रसाद बंटता हैl लोक कथाओं के अनुसार पहले रावी नदी हरिराय मंदिर व् चम्पावती मंदिर के बीच से गुजरती थीl चम्पावती मंदिर का पुजारी रोज सुबह नदी तैर कर पार करके हरिराय मंदिर की पूजा करता थाl चम्बा के राजा साहिल बर्मन ने मंदिर के पुजारी से कहा कि यहां के लोग भी दुसरे मंदिर के दर्शन कर सके कुछ ऐसा उपाय करोl इस समस्या के हल के लिए पुजारी ने 7 दिन हवन व् यज्ञं कियाl अंतिम दिन पुजारी ने धान व् मक्के के फूल को लाल कपड़े में बांध कर, एक सिक्का, मौसमी फल और 1 नारियल को रावी नदी में प्रवाहित किया जिसके फलस्वरूप रावी नदी ने कुछ दिनों बाद अपना रस्ता बदल दियाl उसके बाद बाकी लोग भी दुसरे मंदिर के दर्शन करने लगेl वर्ष 1947 तक मिंजर मेले के दौरान रावी नदी में भैंस को प्रवाहित किया जाता था, यदि भैंस नदी को पार कर जाती यानि दुसरे छोर पहुंच जाती या नदी के बहाव के कारण भैंस नदी में ही बह जाती तो इसे शुभ माना जाता था और अगर भैंस वापिस पहले छोर पर आ जाती तो उसे अशुभ माना जाता थाl ऐसा इसलिए किया जाता था कि वहाँ के लोगों ने रावी नदी का रास्ता बदला था तो उसका प्रकोप वहाँ के लोगों पर क्या होगा, जो की एक धारणा थी जिसे अब बंद कर दिया गया हैl

कुछ लोगों का कहना है कि मिंजर मेले का सम्बन्ध चम्बा के राजा की त्रिगर्त (कांगड़ा) पर विजय से है और कुछ का कहना है कि रावी नदी का रास्ता जो बदला था उससे है क्योंकि मिंजर यानि धान और मक्के के फूलों को इतनी महत्वता तो वहीं से ही हैl मिंजर मेले का पूरा इतिहास पढने और समझने पर ये निष्कर्ष निकलता है कि रावी नदी का रास्ता बदलना, चम्बा के राजा का विजय हो कर वापिस लौटने से काफी पुराना हैl लेकिन चम्बा का राजा जो विजय हो कर लौटा वो भी लगभग उसी मौसम में वापिस लौटा जब मौसम मिंजर का समय था धान और मक्के की फसल का था इसलिए वहाँ के लोगों ने राजा के विजय होकर लौटने पर उन्हें मिंजर व् मौसमी फल भेंट कियेl अब ये चम्बा वासियों के लिए 2 बड़ी बातें एक साथ हो गई थी तो उन्होंने इस मेले का जश्न दोगुना कर दियाl

मेले का वर्तमान

इस मेले का शुभ आरम्भ मिर्जा शबीबेग के परिवार द्वारा रघुनाथ और लक्ष्मी नारायण मंदिर को मिंजर भेंट कर के होता हैl मेले की शोभा यात्रा राजमहल अखंड चंडी से शुरू होती हैl जिसमें वहाँ के स्थानीय देवी देवता भी शामिल होते हैl सभी लोग रंगबिरंगी चम्बा वासियों की संस्कृति से जुड़ी पौशाक पहनते है जिसमें वे आज भी धान व् मक्के के फुल को लाल कपड़े में बंधकर एक मुलायम रेशम की लटकन से अपनी पौशाक में रखते हैl इसके साथ इसमें एक रुपए का सिक्का, मौसमी फल व् नारियल लोहन नदी में प्रवाहित किये जाते हैl राजाओं के समय में सबसे पहले राजा प्रवाहित करते थे और अब मुख्यअतिथि प्रवाहित करते है और उसके बाद सभी लोग मिंजर, सिक्का, फल व् नारियल को लोहन नदी में प्रवाहित करते हैl

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