देवता और डायनों के घोघराधार के अंतिम महासंग्राम में देवता विजयी रहे हैं। इस बार चार युद्धों में देवता तथा तीन स्थानों पर डायनें जीती हैं, जिस कारण देवताओं की जीत बताई गई। मंदिर में गुर के माध्यम से ये भविष्यवाणी की गई कि देवता के जीतने से जनमानस के लिए अच्छा रहेगा। ज्यादा आपदाएं घटित नहीं होगी। हालांकि, फसलें इत्यादी कई जगह सामान्य तो कई जगह कम होगी।
जिला मंडी तुंगल क्षेत्र के प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में 69वीं वार्षिक जाग बड़ी धूम धाम के साथ मनाई गई। माता बगलामुखी के गुर अमरजीत शर्मा ने माता के गर्भ गृह में पूजा अर्चना की तथा उसके बाद मां के गुर ने अनेक प्रकार की देववाणी करके भक्तों का मार्ग दर्शन भी किया। देवता और डायनों के बीच युद्ध की सबसे पहले भविष्यवाणी प्रसिद्ध शक्तिपीठ माता बगलामुखी मंदिर सेहली में 66वीं वार्षिक जाग में की जाती है। माता बगलामुखी के गुर अमरजीत शर्मा द्वारा गणेश चतुर्थी की संध्या पर मंदिर के गर्भ गृह में पूजा-अर्चना की गई और देवी द्वारा बताए गए आदेशों का पालन किया गया। गुर अमरजीत शर्मा ने बताया कि माता बगलामुखी का 10 महाविद्याओं में आठवां स्थान है जिन्हें शत्रुओं का विनाश करने वाली देवी माना जाता है। संगीत मंडली साईगलू ने पूरी रात मां की महिमा का गुणगान किया।
कहां-कहां हुए युद्ध
गुर अमरजीत ने बताया कि इस बार 7 स्थानों पर युद्ध हुए हैं, जिनमें दक्षिण भारत के समुद्र टापू और हिमाचल प्रदेश जिला मंडी की घोघराधार प्रमुख हैं। युद्ध के लिए यह 2 स्थान हर वर्ष निश्चित होते हैं लेकिन बाकी के 5 स्थान बदलते रहते हैं। इस बार गंगातट, कुरुक्षेत्र, सिकंदराधार, शिकारीधार व कांगड़ा किला सम्मिलित हैं। समुद्र टापू से युद्ध की शुरूआत होती है और घोघराधार में अंतिम महासंग्राम होता है।
क्या-क्या हुई भविष्यवाणी
4 स्थानों पर देवता डायनों व 3 पर डायनों के जीतने पर देवताओं की विजय मानी गई। इससे फसल में वृद्धि होगी लेकिन अल्प मृत्यु, अकाल मृत्यु, सड़क दुर्घटनाएं, प्राकृतिक प्रकोप व रोग व्याधी में वृद्धि होगी। यदि देवता जीतें तो केवल फसल कम होती है लेकिन जानमाल सहित सभी सुरक्षित रहते हैं और अल्प मृत्यु नहीं होती है।
कैसे मिलती है गुर की पदवी
प्रदेश के मंडी जिला के ऊपरी भागों में बीज रूप में आज भी देवत्व के प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं। कभी-कभी पानी पर चलने के बाद गुर की पदवी मिलती है तो कहीं पहाड़ों की बड़ी चट्टानों में अदृश्य होने के बाद वहां से प्रमाण सहित निकलने पर गुर की पदवी मिलती है। माहूंनाग के गुर की परीक्षा खाली हाथ सतलुज नदी में छलांग लगाकर हाथ में सूखी मिट्टी लाना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही पत्थर और कैक्टस खाने जैसी कांटेदार चीजें भी सहज भाव से खानी पड़ती हैं।
घोघरधार में होता है निर्णायक युद्ध
बता दें कि हिमाचल प्रदेश के अधिकांश भागों में भादों यानि भाद्रपद की अमावस्या को डैनी वांस(डैणवांस, डुंगवांस) के नाम से जाना जाता है। लोक मान्यता है कि इस दिन डायनें, तांत्रिक, जादू टोना करने वाले, गुर और चेले आदि घोघरधार जाते हैं जहां पर वे देवता और डायनों के बीच अंतिम युद्ध में भाग लेते हैं। उत्तर भारत में भाद्रपद महीने को काला महीना कहा जाता है। मान्यता है कि काला महीना शुरू होते हैं सभी देवता मंदिरों को छोड़ देते हैं। इस माह के दौरान देवता युद्ध में चले जाते हैं तथा जादू टोना हावी हो जाता है। देवता विभिन्न स्थानों में डायनों के साथ युद्ध करते हैं। इस कड़ी में अंतिम और निर्णायक युद्ध घोघरधार में होता है। इस युद्ध के विजेता का फ़ैसला पत्थर चौथ के दिन होता है। इस युद्ध का पूरा हाल और लागत में लगाए गए लोगों के नाम नागपंचमी के दिन प्रदेश के विभिन्न मंदिरों में सुनाए जाते हैं। जोगिन्दर नगर से 22 किमी दूर चतुर्भुजा माता मंदिर में भी यह घोषणा की जाती है।
झाड़ू पर बैठ कर जाती है डायनें
लोक मान्यता के अनुसार भाद्रपद महीने में हिमाचल प्रदेश के अलग अलग स्थानों से सभी डायनें झाड़ू पर बैठ कर घोघरधार के मैदान में पहुँचती हैं और युद्ध करती हैं। किवदंती के अनुसार डायनें युद्ध में पलड़ा भारी होते ही लोगों, जानवरों और खेतों आदि को लागत पर लगाती है।
यदि डायनें युद्ध में हार जाती हैं तो लागत में लगे लोगों के जीवन को ख़तरा होता है। युद्ध के दौरान लागत में लगाए जाने से बचने के लिए लोगों को अभिमंत्रित सरसों के दाने दिए जाते हैं जो वे अपनी जेब में रखते हैं।
कहां है घोघर-धार?
धार किसी पहाड़ी यार पर्वत को कहा जाता है। जिला मंडी के मंडी-पठानकोट नैशनल हाईवे पर स्थित पद्धर और ग्वाली के बीच उत्तर-पूर्व की पहाड़ी के चोटी पर स्थित है घोघर-धार। घोघर-धार एक अधिकांश समतल क्षेत्र है जहाँ देवों और डायनों के मध्य युद्ध होता है. यहाँ युद्ध का स्थान चिन्हित है और युद्ध के समय कोई भी उस स्थान में नहीं जाता है।
लोग जलाते हैं दीया
वैसे तो भादों मास में घरों के बाहर दिया जला कर रखा जाता है ताकि जादू टोना का उन पर प्रभाव न हो। खासकर डैणवाँस के दिन सब लोग दिया जरूर जलाते हैं। इस दिन ग्रामीण लोग अपने पशुओं को पड़ने वाले पिंथडो/चिड़णों को जलाया जाता है।साथ में कहते हैं कि डायनों ले जाओ अपने साथ घोघरधार।
हालांकि चिड़णों को जलाने की परम्परा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में चिड़ाणु त्यौहार के रूप में मनाई जाती है। काले महीने यानि भादों में नई नवेली दुल्हनें भी अपने मायके चली जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि नयी दुल्हनों के लिए अपनी सास को देखना शुभ नहीं होता है इसलिए उन्हें मायके में भेज दिया जाता है। इसलिए कोई भी शुभ कार्य भाद्रपद महीने में नहीं होता है।
