पूरे देश सहित हिमाचल प्रदेश में इस वक्त हर जगह दीपावली की तैयारियां चल रही हैं। बाजार सज चुके हंै। घर में रौनक लौटने को है, हिंदू धर्म के इस सबसे बड़े पर्व के लिए अब चंद दिन ही शेष रह गए हैं। अमीर हो या गरीब, व्यापारी हो या कोई छोटो रेहड़ी वाला, दिवाली सबके लिए एक समान है। बच्चों से लेकर बुजर्गों तक शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो ये कहे कि उसे दीपावली का पर्व ज्यादा अच्छा नहीं लगता।
इस त्योहार की खासियत ही यह है कि हर किसी को अपने रंग में रंग देता है, इसलिए तो हर कोई सपरिवार इसे मनाना चाहता है, लेकिन हिमाचल में एक गांव ऐसा भी है, जहां सपरिवार तो छोडि़ए कोई अकेले भी इस पर्व को नहीं मनाता। जब पूरा देश जगमगा रहा होता है, तो यहां सन्नाटा पसरा होता है। न रंगोली बनती है, न लजीज पकवान, इनके लिए दिवाली होकर भी नहीं होती। यह गांव और कोई नहीं, बल्कि हिमाचल के हमीरपुर से कुछ ही दूरी पर स्थित सम्मू गांव है, जहां वर्षों से इस पर्व को नहीं मनाया गया। कहा जाता है कि जब भी ग्रामीण दिवाली मनाते हैं, तो गांव में कोई अनहोनी हो जाती है। कहा जाता है कि सम्मू गांव की एक बहु सैकड़ों साल पहले सती हो गई थी, लेकिन सती होने से पहले इस गांव को शापित कर दिया था। कहा जाता है कि महिला का पति राजा की फौज में सैनिक था। उस समय दिवाली के मौके पर महिला अपने बेटे सहित अपने मायके जा रही थी, तभी आचानक कुछ सैनिक सामान लेकर आ रहे थे। यह सामान उसी महिला के पति का था, जो कि अब फौज में शहीद हो गया था।
कुछ ऐसा हुआ था…
इसी गांव के बुजर्ग रतन सिंह ने बताया कि सैनिकों ने महिला से फौज में शहीद हुए सैनिक का पता पूछा और इस पर महिला ने कहा कि यह मेरे पति का सामान है। इसके बाद महिला पति के सामान और बेटे सहित वहीं सती हो गई थी। महिला ने सती होने से पहले सम्मू गांव के बाशिंदों को श्रापित कर दिया कि आने वाली सात पीढिय़ों तक कोई भी ग्रामीण दिवाली न मनाए, तब से लेकर आज दिन तक कोई भी सम्मू गांव का ग्रामीण दिवाली का त्योहार नहीं मनाता है। यहां तक की पकवान तक भी नहीं बनाए जात हैं।
कई बार प्रभा तोडऩे की कोशिश हुई, पर…
गांव की महिलाओं ने बताया कि यह कोई अंधविश्वास नहीं हैं, बल्कि जांची परखी बाते हैं। कई बार इस प्रथा को तोडऩे की कोशिश की गई, मगर अंजाम अच्छा नहीं रहा। इसलिए अब हर परिवार इसी प्रथा पर विश्वास कर इसे आगे बढ़ा रहा है, ताकि गांव में सुख शांति बनी रहें। हां यह बात जरूर है कि साल का इतना बड़ त्योहार न मनाने पर महिलाओं को मन में एक टीस जरूर है, जिसे उन्होनें कैमरे पर भी बताया है।
