कुल्लू, हिमाचल प्रदेश: देवभूमि हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध देव संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है, और यहां के कुल्लू जिला में होली का उत्सव विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है। कुल्लू में होली का त्योहार बाकि जगहों से अलग होता है, जहां अन्य स्थानों पर होली 14 मार्च को मनाई जाएगी, वहीं कुल्लू में यह उत्सव 13 मार्च को समाप्त हो जाएगा। इस वर्ष 12 मार्च को छोटी होली और 13 मार्च को बड़ी होली की धूम होगी।
बैरागी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका
कुल्लू में बैरागी समुदाय का इस उत्सव में विशेष योगदान है, जो अयोध्या और ब्रज की परंपराओं को यहां निभाते हैं। बैरागी समुदाय के लोग भगवान रघुनाथ के मंदिर में जाकर ब्रज की बोली में होली के गीत गाते हैं, जो इस परंपरा का हिस्सा बन चुके हैं। बैरागी समुदाय के लोग उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन, और अवध से यहां आए थे, और तभी से वे कुल्लू में अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को संजोए हुए हैं।
गुलाल के साथ शुभारंभ
कुल्लू में होली का उत्सव बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है, जब भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा रघुनाथपुर से निकलती है। इस यात्रा के दौरान बैरागी समुदाय के लोग हनुमान के वेश में लोगों पर गुलाल डालते हैं, जिसे शुभ माना जाता है। रथ यात्रा के बाद, भगवान रघुनाथ की पूजा अर्चना होती है, और लोग उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
बैरागी समुदाय की अनोखी होली परंपरा
कुल्लू में बैरागी समुदाय के लोग अपने से बड़े व्यक्तियों के मुंह और सिर में गुलाल नहीं लगाते। वे रिश्तों की मर्यादाओं का सम्मान करते हुए, बड़े लोगों के चरणों में गुलाल फेंकते हैं और छोटे लोग बड़े व्यक्तियों से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह होली परंपरा रिश्तों की अहमियत को उजागर करती है।
परंपरागत होलिका दहन
13 मार्च को कुल्लू के रघुनाथपुर में पारंपरिक होलिका दहन का आयोजन किया जाएगा। रघुनाथ जी की पूजा अर्चना के बाद, होलिका की परिक्रमा की जाएगी और फिर इसे जलाया जाएगा। इसके साथ ही, भगवान नृसिंह की भी पूजा की जाती है। होलिका दहन के बाद लोग राख और लकड़ी को घर ले जाते हैं, जिससे बुरी शक्तियों का नाश होता है।
वर्षों से जारी परंपरा
कुल्लू में बैरागी समुदाय द्वारा होली की यह परंपरा 1653 से लगातार निभाई जा रही है। यह परंपरा अयोध्या के त्रेता नाथ मंदिर की तर्ज पर है, जहां बैरागी समुदाय द्वारा भगवान राम से जुड़े पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और होली का उत्सव मनाया जाता है।
इस प्रकार, कुल्लू की होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर है, जो न केवल धार्मिक परंपराओं को जीवित रखता है, बल्कि रिश्तों के सम्मान और समाज की एकता का प्रतीक भी है।
