हिमाचल प्रदेश के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने विधायक आशीष बुटेल के प्रश्न के उत्तर में जानकारी दी कि वन भूमि पर तीन पुश्तों से रह रहे लाखों लोगों के कब्जे को नियमित किया जाएगा। इसके तहत वन अधिकार अधिनियम 2006 के प्रावधानों के अनुसार, लोगों को 50 बीघा तक भूमि का मालिकाना हक दिया जाएगा।
मंत्री ने बताया कि पिछले तीन सालों में वन अधिकार अधिनियम की धारा 3 (1) के तहत 637 मामले और धारा 3 (2) के तहत 2690 मामले स्वीकृत किए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि दावेदार का कब्जा 13 दिसंबर 2005 से पहले तीन पुश्तों तक होना चाहिए।
लाहौल स्पीति की विधायक अनुराधा ने अनुपूरक प्रश्न में पूछा कि वन विभाग के अधिकारी उन्हें गलत जानकारी दे रहे हैं। इस पर मंत्री ने आश्वासन दिया कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
मंत्री ने बताया कि 2008 से 2012 तक भाजपा सरकार केंद्र से वन अधिकार अधिनियम के स्पष्टीकरण का इंतजार करती रही। 2012 से 2017 के बीच कांग्रेस सरकार ने पंचायत स्तर पर वन अधिकार समितियां गठित कीं। 2017 से 2022 तक भाजपा सरकार में कोई प्रगति नहीं हुई, लेकिन वर्तमान सरकार ने 4863 मामले निपटाए हैं।
चंबा जिले में सामुदायिक वन अधिकार के तहत अब तक 22,730 हेक्टेयर वन भूमि समुदाय के नाम की गई है, जो राज्य में सबसे अधिक है।
ग्राम सभा में यदि 50% लोग दावेदार के दावे का अनुमोदन करते हैं, तो मालिकाना हक मिलना निश्चित हो जाता है। ग्राम सभा द्वारा अनुमोदित मामले उपमंडल स्तरीय समिति को भेजे जाते हैं, जहां सत्यापन के बाद जिला स्तरीय समिति को भेजा जाता है। उपायुक्त की अध्यक्षता वाली समिति दावों का निपटारा करती है और दस्तावेजीकरण के बाद स्वीकृति देती है। इसके बाद दावेदार को भूमि का पट्टा और मालिकाना हक दिया जाता है।
राज्य स्तरीय समिति (एसएलसी) से स्वीकृत होकर जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) ने कुल्लू में 299, चंबा में 402, लाहौल स्पीति में 54, सिरमौर में 189, किन्नौर में 209, मंडी में 351, हमीरपुर में 79, ऊना में 10, शिमला में 673, बिलासपुर में 58, कांगड़ा में 303 और सोलन में 63 प्रस्ताव स्वीकृत किए हैं। शिमला जिले में सबसे अधिक 673 प्रस्ताव स्वीकृत किए गए हैं।
इस प्रकार, वन भूमि पर रह रहे लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में सरकार की ओर से महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
