शुक्रवारी तालाब के पास हर साल की तरह गणेश मंडल की तैयारियां जोरों पर थीं। लेकिन इस बार माहौल अलग था। पास की मस्जिद के सामने से हिंदुओं के धार्मिक जुलूस निकालने पर मुसलमानों ने आपत्ति जताई। मामला बढ़ा तो नागपुर के जिलाधिकारी ने हिंदुओं की झांकी पर रोक लगा दी। हिंदुओं ने जवाब में गणपति विसर्जन रोकने की ठानी। स्थिति और तनावपूर्ण हुई जब जिलाधिकारी ने भजन मंडली (दिंडी) के मस्जिद के सामने से गुजरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। नतीजा—दंगे भड़क गए, हिंसा हुई।
इसी माहौल में 34 साल के डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जिन्हें ‘डॉक्टरजी’ के नाम से जाना जाता था, ने कांग्रेस के बड़े नेताओं से हिंदुओं के पक्ष में आवाज उठाने की उम्मीद की। लेकिन कांग्रेस की चुप्पी ने उन्हें निराश किया। हेडगेवार ने हार नहीं मानी। उन्होंने ‘दिंडी सत्याग्रह’ शुरू किया। ‘जय विट्ठल’ का नारा बुलंद हुआ और देखते ही देखते 20 हजार लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर आई। यह घटना हेडगेवार के जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी।
हेडगेवार का शुरुआती जीवन और संघर्ष
1 अप्रैल 1889 को नागपुर में जन्मे केशव बलिराम हेडगेवार बचपन से ही देशभक्ति से ओतप्रोत थे। 1897 में, जब रानी विक्टोरिया की ताजपोशी की 60वीं सालगिरह का सरकारी जश्न नागपुर में हो रहा था, 8 साल के केशव ने स्कूल के समारोह में दी गई मिठाई फेंक दी। उनका कहना था, “हम अंग्रेजों के समारोह में कैसे हिस्सा ले सकते हैं?” 13 साल की उम्र में प्लेग ने उनके माता-पिता को छीन लिया। बड़े भाई महादेव ने उनकी परवरिश की। 15 साल की उम्र में हेडगेवार की दोस्ती क्रांतिकारी बी.एस. मुंजे से हुई, जिन्होंने उन्हें बम बनाने की ट्रेनिंग दी।
1910 में हेडगेवार डॉक्टरी पढ़ने कलकत्ता गए। 1915 में डॉक्टर बनकर लौटे, लेकिन नौकरी के बजाय उन्होंने नागपुर में व्यायामशाला खोली, जहां युवाओं के बीच ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा और डिबेट कराए जाते। 1919 में वे कांग्रेस से जुड़े और 1920 में हिंदूवादी नेता एल.वी. परांजपे के भारत स्वयंसेवक मंडल का हिस्सा बने। 1921 में एक भाषण के कारण उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला और एक साल जेल में बिताने पड़े।
जेल में उन्हें विनायक दामोदर सावरकर की किताब Hindutva: Who is a Hindu पढ़ने को मिली। इस किताब ने हिंदुओं के लिए एक संगठन बनाने का विचार उनके मन में पक्का कर दिया। खिलाफत आंदोलन और मालाबार हिंसा में कांग्रेस के रवैये से आहत हेडगेवार ने हिंदू महासभा से भी कुछ समय के लिए जुड़ने की कोशिश की, लेकिन वह उन्हें राजनीतिक समझौतों का संगठन लगा।
RSS की स्थापना
27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन हेडगेवार ने अपने घर में पांच लोगों—गणेश सावरकर, बी.एस. मुंजे, एल.वी. परांजपे और बी.बी. थोलकर—के साथ एक बैठक बुलाई और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नींव रखी। 17 अप्रैल 1926 को संगठन का औपचारिक नामकरण हुआ। हेडगेवार का मानना था कि हिंदू समाज को संगठित और सशक्त करने के लिए एक ऐसा संगठन जरूरी है, जो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से ऊपर हो।
गोलवलकर का उदय
51 साल की उम्र में हेडगेवार को एक अज्ञात बीमारी ने जकड़ लिया। 20 जून 1940 को उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर 34 साल के प्रोफेसर माधव सदाशिव गोलवलकर को चुना। अगली सुबह हेडगेवार का निधन हो गया। 3 जुलाई 1940 को हेडगेवार की पर्ची पढ़ी गई, जिसमें गोलवलकर को संघ प्रमुख बनाने की बात थी। यह फैसला कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था, क्योंकि हेडगेवार के करीबी अप्पाजी को उनका उत्तराधिकारी माना जाता था।
गोलवलकर: गुरुजी की विरासत
19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के रामटेक में जन्मे गोलवलकर बचपन से मेधावी थे। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से जूलॉजी में मास्टर्स करने के बाद वे लैब असिस्टेंट बने। 1930 में एक RSS शाखा में उनकी मुलाकात हेडगेवार से हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। 1936 में गोलवलकर ने रामकृष्ण मिशन में संन्यास लेने की कोशिश की, लेकिन तीन महीने बाद RSS के लिए लौट आए।
1938 में गोलवलकर ने अपनी किताब We, or Our Nationhood Defined में हिंदू राष्ट्र का खाका खींचा। इस किताब में उन्होंने सख्त विचार रखे कि भारत में रहने वाले गैर-हिंदुओं को हिंदू संस्कृति अपनानी होगी या बिना किसी विशेषाधिकार के हिंदू राष्ट्र की अधीनता में रहना होगा।
RSS का विस्तार
गोलवलकर ने RSS की शाखाओं को संगठन का आधार बनाया। उन्होंने प्रार्थना, प्रतिज्ञा, व्यायाम, खेल और विचार-विमर्श को शाखाओं का हिस्सा बनाया। उनकी नेतृत्व शैली और करिश्माई व्यक्तित्व ने RSS को देशभर में फैलाया। ब्रिटिश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, उस समय 76 हजार लोग नियमित रूप से RSS की शाखाओं में शामिल होने लगे थे।
गांधी हत्या और विवाद
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या ने देश को झकझोर दिया। इस घटना ने RSS को विवादों के केंद्र में ला दिया। हालांकि, संगठन ने हमेशा गांधी हत्या में अपनी संलिप्तता से इनकार किया। फिर भी, इस घटना ने RSS की छवि और गतिविधियों पर लंबे समय तक सवाल उठाए।
RSS की विरासत
1925 में शुरू हुआ RSS आज 100 साल बाद भी अपनी विचारधारा और गतिविधियों के कारण चर्चा में बना हुआ है। हेडगेवार और गोलवलकर की नींव पर खड़ा यह संगठन देश के सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
