मंडी। हिमाचल प्रदेश को देवभूमि यूं ही नहीं कहा जाता। यहां की जनता की देव आस्था इतनी अटूट है कि बर्फीले तूफान हो या खतरनाक ऊंची चढ़ाई, देवता के रथ को कंधों पर उठाकर श्रद्धालु हर मुश्किल को पार कर लेते हैं। इसी कड़ी में मंडी जिले की सराज घाटी के भाटकीधार क्षेत्र के गढ़पति देवता छांजणु महाराज 18 वर्ष बाद अपने ऐतिहासिक 9 गढ़ों की परिक्रमा पर निकले हैं। इस परिक्रमा का उद्देश्य देवभूमि को आने वाली बड़ी विपदाओं से बचाना और प्राकृतिक आपदाओं पर विराम लगाना है।
खतरनाक पहाड़ों को भी झुकाती आस्था
शनिवार को सैकड़ों हारियानों (देव श्रद्धालुओं) ने घाटलूगढ़ की सीधी खड़ी चढ़ाई पर रस्सियों की मदद से देवरथ को सुरक्षित पार कराया। तीन घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद देवरथ जब शिखर पर पहुंचा तो पूरा क्षेत्र जयकारों से गूंज उठा। देवलु सनी ठाकुर, हेमराज, गोपी चंद, सुरेश ठाकुर और विशाल ने बताया, “पहाड़ कितना भी ऊंचा हो, देवता के आगे सब बौना हो जाता है। सामान्य दिनों में दो लोग ही रथ उठाते हैं, लेकिन यहां आगे-पीछे चार-चार लोग लग गए। देवता की शक्ति ने हमें जोश दिया।”
परिक्रमा के दौरान गांव-गांव में श्रद्धालु अखरोट-पुष्प वर्षा कर देवता का भव्य स्वागत कर रहे हैं।
देवता का मानवता को कड़ा संदेश
देवता छांजणु महाराज ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पहाड़ों की प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करो, देव स्थलों की पवित्रता बनाए रखो और देव नीति का पूरी तरह पालन करो। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले विनाश को रोकना देवताओं के बस में भी नहीं रहेगा। राजनीति, समाज नीति और देव नीति में विध्वंसकारी कार्यों से दूर रहने की चेतावनी भी दी गई है।
18 दिनों का साहसिक सफर
देव कमेटी प्रधान बीरबल ठाकुर ने बताया कि 10 नवंबर को भाटकीधार से लाव-लश्कर के साथ परिक्रमा शुरू हुई थी जो 18 दिनों तक चली। इस दौरान अनेक दुर्गम रास्तों व खतरनाक चढ़ाइयों को पार किया गया। देवलुओं ने साहस और समर्पण की अनुपम मिसाल पेश की।
आपदा प्रभावितों की पुकार
हाल की भयंकर आपदाओं से घर गंवा चुके लोग जहां-जहां देवता पहुंचे, अपनी व्यथा सुनाकर रो पड़े। प्रभावित भीम सेन और झाबे राम ने बताया, “देवता भावुक हो गए। हमने उनसे यही बचन मांगा कि देवभूमि पर दोबारा ऐसी आपदा न आए।” देवता ने आशीर्वाद दिया कि यदि मनुष्य देव नियमों का पालन करेगा तो आपदाएं दूर रहेंगी।
18 साल में एक बार होने वाली यह गढ़-परिक्रमा सराज क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था का सबसे बड़ा पर्व है। रोमांच, श्रद्धा और प्रकृति संरक्षण का संदेश लिए यह यात्रा पूरे हिमाचल में चर्चा का विषय बनी हुई है।
