शिमला, 19 दिसंबर 2025: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण विकास की रीढ़ रही है। 2006 में देश के पहले चरण में चंबा और सिरमौर जिलों से शुरू हुई यह योजना 2007-08 तक पूरे राज्य में फैल गई। मनरेगा ने गरीब परिवारों को सालाना कम से कम 100 दिनों का गारंटीड रोजगार दिया, ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत की और 268 प्रकार के कार्यों से गांवों का विकास किया।
योजना की सफलता में सबसे बड़ा योगदान ग्राम रोजगार सेवकों (जीआरएस) का रहा। राज्य में शुरू में 1081 जीआरएस के अलावा कंप्यूटर ऑपरेटर, तकनीकी सहायक, जूनियर इंजीनियर आदि की नियुक्तियां हुईं। वर्तमान में करीब 1030 जीआरएस ईमानदारी से सेवाएं दे रहे हैं। शुरुआती दौर में हाथ से मस्टरोल भरना, नकद मजदूरी देना से लेकर अब ई-मस्टरोल, मोबाइल ऐप से हाजिरिया, आधार आधारित ऑनलाइन भुगतान, तीन चरणों में जियो-टैगिंग, ई-केवाईसी और युक्तिधारा पोर्टल तक – सभी तकनीकी बदलावों को बिना विशेष ट्रेनिंग के जीआरएस ने सफलतापूर्वक लागू किया। इन प्रयासों से विभाग और सरकार को कई राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले।
लेकिन इन सेवकों की अपनी स्थिति दयनीय बनी हुई है। 17-18 साल से अधिक सेवा देने के बावजूद उन्हें संविदा पर रखा गया है। कोई पदोन्नति नहीं, कोई करुणा आधारित नियुक्ति का प्रावधान नहीं, कोई मेडिकल सुविधा नहीं और वेतन भी समय पर नहीं मिलता। ग्रामीण विकास विभाग में रिक्त पदों पर समायोजन या सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग वर्षों से लंबित है। मीडिया में समय-समय पर वेतन देरी और नियमितीकरण की मांगें सुर्खियां बनती रही हैं, लेकिन कोई ठोस नीति नहीं बनी। केंद्र और राज्य सरकार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालती रही हैं।
अब स्थिति और गंभीर हो गई है। संसद ने हाल ही में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025 (वीबी-जी राम जी बिल) पारित कर दिया है, जो मनरेगा को पूरी तरह प्रतिस्थापित करेगा। नई योजना में रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं, फोकस जल सुरक्षा, ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका पर होगा। हिमाचल जैसे हिमालयी राज्य में फंडिंग 90:10 रहेगी, लेकिन योजना का स्वरूप बदल जाएगा।
ग्राम रोजगार सेवकों में दहशत है – नई योजना में उनकी नौकरियों का क्या होगा? वर्षों से नियमितीकरण की आस लगाए बैठे ये कर्मचारी अब अनिश्चितता के दौर में हैं। क्या 18 साल की सेवा व्यर्थ जाएगी? क्या संविदा का कलंक जीवनभर रहेगा? सरकारों ने बदलाव तो ला दिया, लेकिन इन मेहनती सेवकों की अनदेखी क्यों?
हिमाचल प्रदेश ग्राम रोजगार सेवक संघ लंबे समय से नियमितीकरण और बेहतर सुविधाओं की मांग कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि योजना बदलने से पहले ऐसे कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। अब सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार इनकी पुकार सुनेगी या ये अभागे कर्मचारी हमेशा की तरह अनसुने रह जाएंगे?
