Agency:News18Hindi
भारत के नेशनल हाईवेज पर सफर करते समय रंग-बिरंगे, फिल्मी सितारों की तस्वीरों और शेरो-शायरी से सजे भारी-भरकम ट्रकों के पीछे एक लाइन हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचती है— ‘Horn OK Please’।
विदेशों में जहां बेवजह हॉर्न बजाने को बदतमीजी या गुस्से का इजहार माना जाता है, वहीं हमारे देश में ट्रक वाले खुद बड़ी विनम्रता से लिखकर चलते हैं कि ‘भाई, ओवरटेक करने से पहले प्लीज हॉर्न बजाओ’। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ भारत में ही दिखने वाले इस अनोखे और आइकॉनिक ट्रेंड की शुरुआत कैसे हुई थी? यह सिर्फ कोई रैंडम ट्रक आर्ट या स्लोगन नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक दिलचस्प इतिहास छिपा है, जिसका सीधा कनेक्शन दूसरे विश्व युद्ध और टाटा के साबुन से है।
आइए जानते हैं इस स्लोगन के पीछे की दो सबसे लोकप्रिय कहानियां:
1. दूसरे विश्व युद्ध (World War II) का वो खौफनाक कनेक्शन
यूं तो इसे लेकर कोई पुख्ता सरकारी दस्तावेज मौजूद नहीं हैं, लेकिन सबसे भरोसेमंद थ्योरी दूसरे विश्व युद्ध के दौर से जुड़ती है। उस समय पूरी दुनिया में तेल (डीजल-पेट्रोल) की भयंकर किल्लत हो गई थी। इस कमी को पूरा करने के लिए ट्रकों को चलाने के लिए डीजल की जगह केरोसिन (मिट्टी का तेल) का इस्तेमाल किया जाने लगा।
केरोसिन बेहद ज्वलनशील ईंधन होता है। जरा सी टक्कर या एक्सीडेंट होने पर गाड़ी में भीषण आग लग सकती थी। इसी भयंकर खतरे को देखते हुए ट्रकों के पीछे एक सख्त चेतावनी लिखवाई गई— ‘Horn Please. On Kerosene.’
मकसद साफ था: “यदि आप केरोसिन से चल रहे ट्रक के पीछे गाड़ी चला रहे हैं, तो ओवरटेक करने से पहले हॉर्न जरूर बजाएं ताकि ड्राइवर सतर्क रहे।”
धीरे-धीरे वक्त बदला और यही ‘On Kerosene’ छोटा होते-होते सिर्फ ‘OK’ में तब्दील हो गया, जिससे पूरा स्लोगन ‘Horn OK Please’ बन गया।
2. टाटा का ‘शातिर’ बिजनेस माइंडसेट और साबुन वाली थ्योरी
इस स्लोगन के पीछे सिर्फ जंग का ही इतिहास नहीं है, बल्कि भारत के सबसे बड़े बिजनेस घरानों में से एक ‘टाटा’ का एक बेहद दिलचस्प विज्ञापन भी जुड़ा है। यह थ्योरी टाटा ऑयल मिल्स के एक डिटर्जेंट ब्रांड से संबंधित है, जिसका नाम ‘OK’ था और उसका लोगो कमल का फूल हुआ करता था।
अपने इस नए वाशिंग बार को प्रमोट करने के लिए कंपनी ने एक अनोखा रास्ता चुना। उन्होंने उन ट्रकों के पीछे इस साबुन का विज्ञापन पेंट करना शुरू कर दिया, जिन पर पहले से ही बाईं और दाईं तरफ ‘Horn Please’ लिखा होता था।
टाटा ने इस ‘OK’ शब्द और कमल के सिंबल को ट्रक के बिल्कुल बीच में पेंट कर दिया। इसके बाद ट्रक का पिछला हिस्सा कुछ ऐसा दिखने लगा— बाईं तरफ ‘Horn’, बीच में ‘OK’ (विज्ञापन), और दाईं तरफ ‘Please’। वक्त के साथ साबुन तो बाजार से गायब हो गया, लेकिन यह डिजाइन ट्रक ड्राइवरों को इतना पसंद आया कि यह लाइन भारतीय सड़कों पर हमेशा के लिए अमर हो गई।
सिर्फ चेतावनी नहीं, ड्राइवरों का हमसफर है ये स्लोगन
चाहे इसकी शुरुआत विश्व युद्ध की मजबूरी से हुई हो या साबुन के विज्ञापन से, आज ‘Horn OK Please’ भारतीय रोड कल्चर का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। भारत में ट्रक चलाने वाले ड्राइवर अपने घरों से दूर, हफ्तों तक सड़कों पर जिंदगी बिताते हैं। ऐसे में वे अपने ट्रकों को सिर्फ एक गाड़ी नहीं, बल्कि अपने हमसफर की तरह मानते हैं। वे इन्हें सजाते हैं, संवारते हैं और इस पुरानी विरासत को अपनी गाड़ियों पर जिंदा रखते हैं।
तो अगली बार जब आप हाईवे पर किसी ट्रक के पीछे इस स्लोगन को देखें, तो बेझिझक हॉर्न बजाइए, क्योंकि यह पूरी तरह से ‘ओके’ है!
