बैजनाथ | 26 जून (विकास बावा )
मुख्यमंत्री के दौरे से सड़क, संचार और मूलभूत सुविधाओं की जगी नई उम्मीद
बैजनाथ। पीर पंजाल की दुर्गम पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसे बड़ा भंगाल तक पहुंचने का सफर आज भी किसी रोमांच से कम नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत के बीच संतुलन बनाने जैसा है। धारडी का खतरनाक पहाड़ लांघकर ही इस घाटी तक पहुंचा जा सकता है, जहां संकरी पगडंडियों के एक ओर ऊंचे पहाड़ और दूसरी ओर सैकड़ों मीटर गहरी खाई में बहती रावी नदी हर कदम पर चुनौती पेश करती है।
27 जून को मुख्यमंत्री के प्रस्तावित बड़ा भंगाल दौरे से घाटी के लोगों में वर्षों पुरानी उम्मीद फिर से जागी है। ग्रामीणों को विश्वास है कि इस बार उनकी सबसे बड़ी मांग—सड़क सुविधा—को गंभीरता से सुना जाएगा और विकास के नए रास्ते खुलेंगे।
हर सफर एक अग्नि परीक्षा
बड़ा भंगाल के लोगों के लिए यह कठिन रास्ता रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। मामूली चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। यहां के बुजुर्ग बताते हैं कि बचपन से ही बच्चों को इन दुर्गम पगडंडियों पर चलने का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकें।
बीमारी या आपातकाल की स्थिति में आज भी मरीजों और बुजुर्गों को पालकी या पीठ पर उठाकर करीब 22 किलोमीटर दूर होली तक पहुंचाया जाता है। वहां से ही सड़क मार्ग के जरिए चंबा ले जाया जाता है। हवाई सुविधा उपलब्ध न होने के कारण स्थानीय युवाओं ने पिछले वर्ष भी कई रेस्क्यू अभियान चलाकर लोगों की जान बचाई थी।
सड़क के इंतजार में बीत गए दशक
घाटी तक सड़क पहुंचाने की मांग नई नहीं है। पूर्व में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी यहां का दौरा कर लोगों की समस्याएं सुनी थीं। लोक निर्माण विभाग ने लगभग 48 करोड़ रुपये की लागत से सड़क निर्माण के टेंडर भी जारी किए, लेकिन निर्माण कार्य धारडी नाले से आगे नहीं बढ़ पाया।
अब मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के दौरे से ग्रामीणों को उम्मीद है कि वर्षों से लंबित सड़क परियोजना को नई गति मिलेगी और फाइलों पर जमी धूल हटेगी।
संचार और बिजली की बदहाल स्थिति
डिजिटल युग में भी बड़ा भंगाल संचार सुविधाओं से पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है। छह वर्ष पहले बीएसएनएल के 4जी सैचुरेशन प्लान के तहत मोबाइल टावर लगाने की घोषणा हुई थी। ग्रामीणों ने इसके लिए भूमि भी दान कर दी, लेकिन आज तक टावर स्थापित नहीं हो पाया।
इसके अलावा पिछले 12 वर्षों से 40 किलोवाट का विद्युत परियोजना बंद पड़ी है। सैटेलाइट फोन और सोलर लाइट जैसी वैकल्पिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन खराब मौसम में ये भी जवाब दे जाती हैं।
बाढ़ से बढ़ा संकट
पिछले वर्ष बादल फटने और रावी नदी में आई भीषण बाढ़ ने बड़ा नुकसान पहुंचाया। उपजाऊ कृषि भूमि बह गई और कई मकानों पर खतरा मंडराने लगा। ग्रामीणों ने नदी के तटीकरण और सुरक्षा कार्यों को भी प्राथमिकता से कराने की मांग उठाई है।
मुख्यमंत्री के स्वागत को तैयार ग्रामीण
प्रधान कंचन ठाकुर, पूर्व प्रधान गसा राम, धूनी लाल, रूप प्रधान संजय प्रजापति तथा निपुण जिंदल सहित पूरे गांव में मुख्यमंत्री के दौरे को लेकर उत्साह का माहौल है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुने तो बड़ा भंगाल विकास की नई इबारत लिख सकता है।
आज भी नहीं मिला जनजातीय दर्जा
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन बिताने के बावजूद बड़ा भंगाल के लोगों को अब तक जनजातीय क्षेत्र का दर्जा नहीं मिल पाया है। यह मांग 1980 के दशक से लगातार उठाई जा रही है, लेकिन आज तक पूरी नहीं हो सकी।
सड़क परियोजना की वर्तमान स्थिति
प्रस्तावित नयाग्रां–बड़ा भंगाल सड़क मार्ग की कुल लंबाई लगभग 24 किलोमीटर है। इसमें घोघनी तक करीब 3.5 किलोमीटर सड़क बन चुकी है, जबकि धारडी तक लगभग 6 किलोमीटर कच्चा मार्ग तैयार है। गारगु नाले पर वैली स्पैन ब्रिज भी बन चुका है, लेकिन आगे का क्षेत्र अत्यंत जटिल होने के कारण आईआईटी विशेषज्ञों की तकनीकी सहायता की आवश्यकता बताई गई है। वहीं करीब तीन किलोमीटर हिस्से में वन्यजीव अनुमति और कुछ निजी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भी अभी लंबित है।
बड़ा भंगाल आज भी हिमाचल का वह इलाका है जहां साहस रोजमर्रा की जरूरत है। अब निगाहें मुख्यमंत्री के दौरे पर टिकी हैं कि क्या इस बार घाटी के लोगों को सड़क, संचार, बिजली और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का सपना साकार होता है या फिर उम्मीदें एक बार फिर इंतजार में बदल जाती हैं।
